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होकर भी पहाड़ के आगे

होकर भी पहाड़ के आगे

  होकर भी पहाड़ के आगे, देख न पाना, न बंध पाना, कि रोशनी के हों परदे, कि लुटता हो अंतर, कि वीरान होती हों, मन की सब गलियां, होकर…

यादों के किताबखाने में

यादों के किताबखाने में

कभी कांपते दिल /हाथों से   एक मूरत गढ़ी थी  जिसमें रंग भरने थे ज़माने भर के  अपने हाथों से, मन मुताबिक… पलकों की कोरों में कुछ सपने छिपाए थे  जो…

राजभाषा के विस्तार में

राजभाषा के विस्तार में

राजभाषा के विस्तार में वो जो लगातार कर रहे हैं बातें उनकी मेरी भाषा की मेरी भी प्रिय भाषा की बता रहे हैं क्या है प्रिय उस भाषा को और…

मेरे प्यारे पापा

मेरे प्यारे पापा

मेरे पैदा होते है जिसने मुझे पहली बार गोद उठाया मेरी आंख खुलते ही जिसे मैनें पहली बार देखा मेरा पहला कदम उठाना सिखाया जिसने वो है मेरे प्यारे पापा…