मैं उन किशोरियों का दर्द भूल न सकी

इथियोपिया के एक छोटे-से कस्बे में वह पैदा हुईं। आठ भाई-बहनों में सातवीं। परिवार की सबसे छोटी बेटी। फ्रेवेइनी मेब्रातू के माता-पिता ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था। दरअसल, फ्रेवेइनी के पिता 12 साल की उम्र में ही गांव छोड़कर पास के कस्बे में अपनी जिंदगी बनाने आ गए थे। वहां के चर्च से उन्हें इतना अक्षर ज्ञान मिल गया कि वह पढ़-लिख लेते थे। जिंदगी एक इज्जत का मुकाम हासिल कर सके, इसके लिए उन्होंने कई तरह के काम किए और आखिरकार एक छोटे-से मोटल ने उन्हें उनके समुदाय में स्थापित कर दिया।
फ्रेवेइनी के पिता प्रगतिशील सोच के व्यक्ति थे। जीवन के संघर्षों ने उन्हें यह गहरे एहसास कराया था कि आने वाले दौर में शिक्षा बेहद महत्वपूर्ण होने जा रही है। अपनी तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बीच भी उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके आठों बच्चे स्कूल जा सकें। बच्चों ने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। फ्रेवेइनी तो शुरू से ही पढ़ने में काफी होशियार थीं। इसलिए वह सबकी चहेती भी थीं। मगर एक दिन उनके साथ कुछ ऐसा घटा, जिसके बारे में उन्होंने न कभी सुना था, और न सोचा था।
उनकी उम्र तब 13 साल थी। फ्रेवेइनी रोज की तरह ही स्कूल गईं। वहीं पर उन्हें अचानक पेट में दर्द उठा और मासिक धर्म शुरू हो गया। फ्रेवेइनी भय से कांप उठीं। मां और चार बड़ी बहनों ने कभी पीरियड के बारे में उन्हें कुछ बताया नहीं था। शारीरिक पीड़ा से अधिक उन्हें मानसिक झटका लगा था। ज्यादातर पिछडे़ देशों व रूढ़ समाजों की तरह इथियोपियाई समाज में भी इसे लेकर काफी तंग नजरिया है। इसके बाद लड़कियों को शादी की ओर धकेल दिया जाता है या उन्हें ‘अशुद्ध’ करार दे दिया जाता है।
फ्रेवेइनी ने किसी से इसका जिक्र नहीं किया। उत्तरी इथियोपिया की ज्यादातर लड़कियों की तरह वह पीरियड को लेकर काफी परेशान और हताश रहीं। वह सबसे कटकर रहने लगीं। कुछ समय बाद उन्हें अपनी सहेलियों से पता चला कि उन सबको इस स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। उन दिनों वे फटे-पुराने कपडे़ को सैनिटरी पैड के रूप में इस्तेमाल करने को मजबूर थीं। किसी शर्मिंदगी से बचने के लिए ये किशोरियां एक बड़ा रूमाल हमेशा अपने साथ रखतीं, ताकि उसे  कमर पर बांध सकें। इस शारीरिक परेशानी से जुडे़ कई सवाल थे, जिनके जवाब फ्रेवेइनी जानना चाहती थीं, मगर यह साहस न था कि किसी से वे प्रश्न पूछ सकें।
इन वर्जनाओं को जीते हुए उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने का मौका मिला। अमेरिका जाते वक्त फ्रेवेइनी के पिता ने उनसे यह वादा लिया था कि वह पढ़ाई पूरी करके इथियोपिया लौट आएंगी। अमेरिका में फ्रेवेइनी जब पहली बार एक मेडिसिन स्टोर पर गईं, तो वहां सैनिटरी पैड के विकल्प देखकर हैरान रह गईं। इसके बाद तो वह जब-जब दुकान पर जातीं, उन्हें अपने देश की किशोरियों का ख्याल आता- क्या उनकी दुनिया कुछ बदली होगी? इथियोपिया में हर दस में से एक लड़की आज भी सिर्फ इसी वजह से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ देती है। वहां की लगभग 75 फीसदी महिलाओं की पहुंच से सुरक्षित सैनिटरी पैड दूर है।
साल 1992 में फ्रेवेइनी ने केमिकल इंजीनिर्यंरग की डिग्री हासिल की और उसके बाद इथियोपिया आना-जाना शुरू किया। वह कहती हैं, ‘अपनी हरेक यात्रा के दौरान मैं यह जानने की कोशिश करती कि पीरियड से जुड़ी वर्जनाओं में कोई बदलाव आया है या नहीं? मैं गांवों की औरतों से पूछती, तो वे इसके बारे में बोलने से कतराती थीं, और यदि कोई बताती भी, तो वह एक स्तब्धकारी कहानी होती। मैं यह जानकर बहुत दुखी थी कि इक्कीसवीं सदी में भी हमारे गांवों की औरतें गड्ढे खोदकर उस पर तीन से पांच दिन तक बैठती रहती हैं!’
फ्रेवेइनी हालात को बदलने के लिए बेचैन हो उठीं। वह एक ऐसा सैनिटरी पैड तैयार करने में जुट गईं, जो न सिर्फ सुरक्षित व गरीब औरतों के लिए किफायती हो, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी मुफीद हो। साल 2005 में दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाला सैनिटरी पैड बनाने में उन्हें कामयाबी मिली। इसका व्यावहारिक प्रयोग भी काफी सफल रहा। साल 2006 में फ्रेवेइनी को इथियोपिया के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस उत्पाद का पेटेंट भी मिल गया।
इस कामयाबी ने उनका हौसला बुलंद
कर दिया। साल 2009 में बैंक से डेढ़ लाख डॉलर का कर्ज लेकर उन्होंने करीब 1,500 वर्गमीटर में एक फैक्टरी शुरू की। अपनी बेटी के नाम से शुरू ‘मरियम सबा सैनिटरी प्रोडक्ट्स फैक्टरी’ में उन्होंने लगभग पचास स्थानीय औरतों को रोजगार मुहैया कराया है और आज यहां से सालाना साढ़े सात लाख पैड निकल रहे हैं। साल 2009 से अब तक आठ लाख से अधिक किशोरियों और औरतों ने इसका लाभ उठाया है। प्रतिष्ठित चैनल सीएनएन  ने फ्रेवेइनी मेब्रातू को 2019 का ‘हीरो ऑफ द ईयर’ चुना है। फ्रेवेइनी कहती हैं- ‘लड़कियों को पैड देना, उन्हें गरिमा और आजादी देना है, ताकि वे जो भी करना चाहती हैं, वह कर पाएं।’

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