सब्र की हत्या करती है ‘मिसेज सीरियल किलर’

‘टॉर्चर तूने अभी देखा ही कहां है? वो तो तू अब देखेगी!’

चर्चित स्ट्रीमिंग साइट नेटफ्लिक्स पर रिलीज फिल्म ‘मिसेज सीरियल किलर’ शुरू होने के ठीक दो मिनट बाद इसकी मुख्य अदाकारा जैक्लीन फर्नान्डीज यह डायलॉग बोलती हैं। लॉकडाउन के दौर में एक कसी हुई साइको-थ्रिलर फिल्म देखने की उम्मीद में बैठे मासूम दर्शक ने तब तक यह कल्पना भी नहीं की होती है कि यह बात उन्हीं से कही जा रही है! शिरीष कुंदर की लिखी और निर्देशित की गई इस फिल्म में कई झोल हैं। मनोज वाजपेयी जैसे उम्दा अभिनेता की मौजूदगी भी इसे बिखरने से नहीं बचा पाती।

यह कहानी है एक छोटे से हिल स्टेशन में रहने वाले दंपति डॉ. मृत्युंजॉय मुखर्जी उर्फ जॉय (मनोज वाजपेयी) और उनकी पत्नी सोना (जैक्लीन फर्नान्डीज) की। इस कहानी में इंस्पेक्टर इमरान शाहिद (मोहित रैना) भी हैं, जो सोना के पूर्व प्रेमी हैं। डॉ. मृत्युंजॉय के क्लीनिक से छह लड़कियों की लाशें बरामद होती हैं। सभी में एक समानता है- वे कुंवारी गर्भवती लड़कियां थीं। उनके कातिल ने उनके पेट में पल रहे भ्रूण को बेदर्दी से ऑपरेशन के जरिये निकाल कर विशेष रसायनिक घोल युक्त जार में बंद कर के रखा है। पुलिस का मानना है कि यह काम कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ ही कर सकता है। डॉ. मृत्युंजॉय स्त्री रोग विशेषज्ञ ही हैं। सारी दुनिया को लग रहा है कि वह दोषी हैं, पर उनकी पत्नी सोना का मानना है कि वह निर्दोष हैं। जब शहर के सारे वकील उनका केस लड़ने से मना कर देते हैं, तो वह रस्तोगी जी (दर्शन जरीवाला) के पास मदद की आस लेकर जाती हैं। मृत्युंजॉय ने कभी रस्तोगी जी की बड़ी मदद की थी। रस्तोगी जी यह केस लड़ने के लिए तैयार तो हो जाते हैं, पर मृत्युंजॉय को बचाने के लिए वह सोना को एक बेहद टेढ़ा रास्ता बताते हैं, जो उसे दुविधा में डाल देता है।

फिल्म की कमजोर कहानी और पटकथा इसकी सबसे बड़ी कमी है। एक्टिंग के लिहाज से मनोज वाजपेयी ने ठीकठाक काम किया है, हालांकि उनकी भूमिका बेहद छोटी है। जैक्लीन ने पूरी फिल्म में ओवर एक्टिंग की है। हालांकि उनसे ज्यादा गलती उनका किरदार गढ़ने वालों की और निर्देशक है। पति के जेल जाने के बाद भी उनके फैशन सेंस और स्टाइल में कोई कमी नहीं आती। वह अपराध भी करती हैं तो एक से एक डिजाइनर परिधान पहन कर। मनोज वाजपेयी के अलावा जिस किरदार ने ठीकठाक काम किया है, वह हैं अभिनेत्री जेन मारी। फिल्म में उन्होंने अनुष्का तिवारी नामक एक किशोरी का किरदार निभाया है। अपने किरदार से उन्होंने पूरी हद तक न्याय किया है।

फिल्म में तर्क तलाशने की कोशिश तो बिलकुल मत करियेगा, क्योंकि वे एकदम ही नदारद हैं। एक दृश्य में एक किरदार को लोकल एनस्थीसिया का इंजेक्शन दिया जाता है, जिससे वह पूरी तरह बेहोश हो जाता है। कैसे, यह इस फिल्म को बनाने वाले ही बता सकते हैं। फिल्म के कुछ दृश्य बेहद हास्यास्पद भी हैं, जैसे, एक छोटे से पहाड़ी कस्बे की सुनसान सड़क पर एसयूवी कार चलाते हुए एक किरदार दूसरे किरदार का पीछा करता है, और दूसरे किरदार को इसकी भनक तक नहीं लगती। इसी तरह एक और दृश्य में हम देखते हैं कि डॉ. मृत्युंजॉय ने अपने अस्पताल की दीवारों पर अपनी पत्नी की ढेरों तसवीरें लगा रखी हैं। इस भुतहा अस्पताल में न तो  कोई नर्स है, न ही वार्डबॉय है और न ही कोई मरीज है।

यह फिल्म गुणवत्तापरक फिल्मों को लेकर नेटफ्लिक्स की विश्वसनीयता को कम करती है। इससे पहले जैक्लीन की ही एक अन्य नेटफ्लिक्स फिल्म ‘ड्राइव’ की जमकर आलोचना हुई थी। और ‘मिसेज सीरियल किलर’ तो उससे भी एक कदम आगे है।

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